RAVINDRAVANI
बज्जू भाई
बज्जू भाई
रामजी बाली
मेरे गुरु राम गोपाल बजाज
बात उन दिनोँ की है जब मैँ मंडी हाउस में रंगमंच के रंगरुट की तरह घूमा करता था। श्री राम सेंटर से दो साला कोर्स कर रहा था और
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय तथा रंग मंडल की प्रस्तुतियोँ को देखा करता था। उन दिनोँ प्रस्तुतियोँ का और उनके अभिनेताओं का ऐसा गहरा असर मेरे मन मस्तिष्क पर पड़ता था कि क्या बताऊँ। यह लोग किसी स्टार की तरह दिखते थे। यह वह दौर था जब राष्ट्रीय़ नाट्य विद्यालय के रंग मंडल मेँ `थैंक्यू बाबा लोचन दास’, `अग्नि और बरखा’ एवँ `आइंस्टाइन’ सरीखे नाटक देखने को मिलते थे। उन दिनों दिल्ली के रंगमंच पर इन सब स्टारों का एक सुपर स्टार भी था- मेरी नजर में वह थे राम गोपाल बजाज थे जिन्हें प्यार से लोग बज्जू भाई भी कहते हैँ। सोचा करता था कि क्या कभी इनसे संवाद करने का भी मौका मिलेगा इस इच्छा से आगे दिमाग कल्पना ही नहीँ कर पाता था। लेकिन मुझे जरा भी अंदाजा नहीँ था कि यह सब इतनी जल्दी होने वाला है। हुआ यूँ कि 1997 मेँ मैनें राष्ट्रीय नाटक विद्यालय मेँ दाखिले के लिए पहली बार प्रयास किया एवँ साथ ही साथ श्री राम सेंटर रंग मंडल मेँ भी आवेदन कर दिया। रिजल्ट आया तो मैँ राष्ट्रीय नाटक विद्यालय मेँ चुने जाने से रह गया लेकिन श्रीराम सेंटर रंगमंडल में चुन लिया गया। राष्ट्रीय नाटय विद्यालय मेँ न चुने जाने के क्षोभ से निकलकर दो चार दिन बाद श्री राम सेंटर रंग मंडल ज्वाइन कर लिया। बाद मेँ पता चला कि मैँ राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय छात्रोँ मेँ फर्स्ट वेटिंग मेँ था। लेकिन उस जमाने मेँ वेटिंग लिस्ट जाहिर नहीँ की जाती थी। संयोग वर्ष उसी वर्ष नए सत्र मेँ एन.एस. डी. रंग मंडल मेँ पहला नाटक करने बापी बोस आये जो `दिल्ली चलो’ नाटक करने वाले थे। उन्हें रंग मंडल के कलाकारोँ के अतिरिक्त भी अभिनेताओं की आवश्यकता थी। इधर बज्जू भाई के दिमाग मेँ मेरा नाम कहीँ रह गया था। शायद वेटिंग लिस्ट के उम्मीदवार के तौर पर। मुझे अपने एक मित्र सुंदरलाल छाबड़ा, जो राष्ट्रीय नाटय विद्यालय मंडल मेँ थे, से सूचना मिली कि रंगमंडल मेँ कुछ नए लोगोँ को लिया जाना है और मेरे नाम की भी चर्चा हुई थी। मुझे अपने पर विश्वास नहीँ हो रहा था कि राम गोपाल बजाज जी को मुझ जैसे नए साधारण रंगकर्मी का नाम भी याद होगा।
खैर, तो इस प्रकार मेँ विद्यालय से पहले रंग मंडल मेँ आया। एक साल तक बतौर अभिनेता रंग मंडल मेँ कार्य किया और फिर 1998 मेँ विद्यालय का छात्र बना। मैँ इसे अपना सौभाग्य मानता हूँ कि मैँ उस दौर मेँ विद्यालय का विद्यार्थी बना जब हमारे निदेशक राम गोपाल बजाज थे और यही से हमारे बीच गुरु चेले का रिश्ता प्रारंभ हुआ। ऐसा माना जाता है कि विद्यालय के निदेशक के व्यक्तित्व और रचना धर्मिता का उनके शिष्यों पर काफी प्रभाव होता है औरोँ के बारे मेँ मैँ इतने दावे से नहीँ कह सकता किंतु मुझ पर तो 100 प्रतिशत अपने निर्देशक का प्रभाव पड़ा। मैँ तो उनका छात्र बनने से पहले ही उनका फैन था। मुझ पर तो यह प्रभाव होना स्वाभाविक था। इसका एक दूसरा कारण भी है हम दोनोँ की साहित्य मेँ रुचि है। विशेष कर कविता मेँ। इसमेँ कोई संदेह नहीँ कि मेरे कविता मेँ रुझान के बढ़ने का कारण बजाज सर ही रहे। उन्हें मैने नज़दीक से एक कुशल प्रशासक के तौर पर, एक अध्यापक के तौर पर, एक अभिनेता के तौर पर और एक कला मनीषी के तौर पर देखा है। और एक सौम्य,मृदु एवँ दलित शोषित के लिए करुणा और उदारता से भरे हुए व्यक्तित्व के तौर पर भी देखा है। बजाज सर के व्यक्तित्व को एक लेख मैँ समेटना संभव ही नहीँ। भविष्य मेँ कभी अवसर बना तो उन पर कम से कम एक किताब तो ज़रूर लिखना चाहूँगा।
एक छात्र की दृष्टि से देखता हूँ तो मैंने बजाज सर को सदा छात्रोँ के साथ खड़े देखा । ज्यादा से ज्यादा और अच्छे से अच्छा क्या सहयोग किया जा सकता है, चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े । पढ़ाई लिखाई के अलावा मेस तक की क्या व्यवस्था पर भी वे पैनी निगाह रखते थे। बजाज सर मोटे तौर पर एक सरल व्यक्ति की छवि रखते हैँ, लेकिन निर्णायक पलों में मैने उनमेँ गजब की दृढ़ता एवँ आक्रोश भी देखा है। लीक को तोड़ कर कुछ नई शुरुआत का साहस करना हो, किसी रुढ़िवादी परंपरा को खत्म करना हो बजाज सर निर्णय लेने से पीछे नहीँ हटते हैं.
भारतीय रंगमंच को भारत रंग महोत्सव की सौगात बजाज सर की ही दूरदर्शिता का परिणाम है। जब इसकी शुरुआत हुई तो हम लोग विद्यालय मेँ प्रथम वर्ष के छात्र थे। कितना उत्साह था हम सब मेँ। आज भी सोच कर मन रोमांच से भर जाता है। किसी दूसरे को कैसे सम्मान देना है यह कोई बजाज सर से सीखे।रा.ना.वि के निदेशक के पद पर रहते हुए अक्सर निदेशकों को ये लाँछन झेलना पड़ता है कि आप पक्षपात करते हैँ किंतु बजाज सर इसमें अपवाद रहे हैँ। उन्होंने अपने धुर विरोधी विरोधी विचार वाले निर्देशकों को स्थान और सम्मान दिया। इसके पीछे मेँ उनके साहित्य के प्रति उनके अनुराग को देखता हूँ। उंहोन्ने सदा दूसरोँ को सुनने एवँ समझने की पूरी कोशिश की। कभी यह नहीँ माना कि वह पूर्ण सत्य के ज्ञाता हैं। मसलन यदि कोई रिहर्सल या कक्षा में देर से पहुंचा और उसने कोई चलता सा बहाना बनाया हो तो भी और जाहिर हो
कि ये साफ़ बहाना है तो भी वह उसमेँ एक प्रतिशत गुंजाइश छोड़ते थे कि हो सकता है यह बहाना नहीं बल्कि सच हो। ।इन्हीं छोटी छोटी चीजोँ से किसी का बड़प्पन दिखाई देता है। जिसे जो दे दिया उसे कभी जताया नहीं । पता नहीँ कितने गुप्त उपकार उंहोन्ने कितनो पर आंख बंद करके किये होंगे। अपने छात्र छात्राओं के प्रति इतनी चिंता कम ही शिक्षकों मेँ देखने को मिलती है। मेरे जैसे कई छात्र उनके संपर्क मेँ आए होंगे। उनमेँ से शायद ही कोई होगा जो उनसे मिलने पर उनकी प्यार भरी गाली- कैसा है तू हरामी, सुनने को बेताब नहीँ रहता होगा। इस लेख मेँ ज्यादा कुछ नहीँ आ पाया है। ये उन पर भविष्य मेँ मेरे द्वारा लिखी जाने वाली किताब की भूमिका की तरह ही देखा जाए।
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