मोलिना सिंह, एक मणिपुरी की दास्तान - रवीन्द्र त्रिपाठी


रवीन्द्रवाणी

देश में विदेशी होेने का अनुभव

रवीन्द्र त्रिपाठी


ये एक दुखद तथ्य है कि जिसे भारत की मुख्यधारा कहते हैं उसमें कुछ संकरापन बाकी है। आकस्मिक नहीं कि उत्तर पूर्व के राज्यों के कई निवासियों को दिल्ली आकर पराएपन का एहसास होता है। दिल्ली और देश के दूसरे राज्यों में भी उत्तर पूर्व वालों के चिंकी कहके पुकारा जाता है और उनकी अलग ढंग से स्टीरियोटाइपिंग की जाती है। कुछ तो ये मानते हैं चिंकी और चीनी में कोई फर्क नहीं है। युवा रंगकर्मी, मूल रूप से मणिपुर की निवासी पर आजकल मुंबई मे रह रही मोलिना सिंह का एकल नाटक `लोकल फॉरेनर’  इसी सामाजिक हकीकत को सामने लाता है। पिछले दिनों दिल्ली के श्रीराम सेंटर में प्रस्तुत ये नाटक सानातोंबी नामक एक मणिपुरी लड़की को तजुर्बों को सामने लाता है। ये बहुभाषी नाटक है जिसमें हिंदी, अंग्रेजी और मणिपुरी का प्रयोग हुआ है। मोलिना ने इस कथक और मणिपुरी नृत्य के तच्वों का भी इस्तेमाल किया।

 सानातोंबी मणिपुर की रहनेवाली लड़की है और दिल्ली के कथक केंद्र में नृत्य सीखने आती है। सानातोंबी को भारत सरकार संस्कृति मंत्रालय का वजीफा भी मिला है। पर दिल्ली में आकर उसे लगता है कि वह किसी पराए देश में आ गई है। यहां  उससे पूछा जाता है कि वह चीन की रहनेवाली है या नेपाल की, उसकी आंखें इतनी छोटी क्यों हैं और वह इतनी छोटी आंखों से कैसे देख पाती है, उसकी नाक इतनी छोटी क्यों है. वगैरह वगैरह। वह नाक पर एक क्लिप लगातार उसे नुकीली करने का प्रयास भी करती और इस प्रक्रिया में उसे काफी दर्द भी होता है। जिस कमरे में वो  बतौर किराएदार यानी पेइंग गेस्ट के रूप में रहती है वहां की मकान मालकिन का व्यवहार भी अजीब है। कथक केंद्र में कुछ सहपाठी या सहपाठिन उससे पूछते हैं कि क्या जहां की रहनेवाली है वहां के लोग कुत्ते भी खाते हैं। एक दुकानदार उसे ज्यादा कीमत पर सामन बेचना चाहता है क्योंकि उसे लगता है कि वह विदेशी है। कुछ लोग सानातोंबी के साथ यौन शोषण की कोशिश भी करते हैं। सानातोंबी कोशिश करती है कि वह दिल्ली में रम जाए पर उसके साथ जो व्यवहार होता है उससे वह लगातार दुखी रहती है। नाटक जाकर इस विंदु पर खत्म होता है कि सानातोंबी नृत्य करते हुए अपने गृहराज्य मणिपुर की सांस्कृतिक खूबियों का बखान करती है।

मोलिना सिंह का ये एकल नाटक भारत में अंतर सांस्कृतिक संबंधों की जटिलता को पेश करता है। आजादी के इतने बरसों के बाद भी हमारे महानगरों में अंतरसांस्कृतिक संबंध पूरी तरह सहज नहीं हुए है। जब एक खास तरह की संस्कृति के लोग किसी कारण से देश के दूसरे हिस्से में, खासकर महानगरों में जाते हैं तो वहां कई प्रकार के पूर्वग्रहों का शिकार होना पड़ता है। अखबारों से लेकर दूसरे सूचना माध्यमों में लगातार ऐसी खबरे आती हैं कि कैसे देश के सूदूरवर्ती इलाकों के निवासी जब दिल्ली. मुंबई, गुवाहाटी या बंहलुरू में रहने या रोजगार की तलाश मे जाते हैं तो उनके साथ किस तरह के भेदभाव होते हैं। इन पूर्वग्रहो की कई वजहें हैं पर मूल रूप में ये है कि हम अभी भी अपने देश के बारे मं बहुत कम जानते हैं और इसकी बहुसांस्कृतिकता के बारे में भी। पर ये भी सही है कि बुहसांस्कृतिकता के बारे में बारे में जानकारी भी तभी बढ़ेगी जब अंतरसांस्कृतिक संबंध बने और लोगों की मानसिकता बदले। मोलिना सिंह का नाटक `लोकल फॉरेनर’ इस दिशा में सकारात्मक दिशा निभा सकता है। मोलिना की हिंदी बहुत अच्छी है और वे लंबे अरसे तक झारखंड के धनबाद में रही हैं। नाटक के समापन के बाद उन्होंने कहा कि देश के अलग अलग हिस्सों के लोगों में आपसी संवाद की कमी है और इसे बढ़ाया जाना चाहिए।


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