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नुक्कड़ नाटकों की बदलती दुनिया
रवीन्द्र त्रिपाठी
नुक्कड़ नाटकों के बारे में आम धारणा रही है, जो बहुत हद तक उचित ही
है, कि ये राजनैतिक प्रतिरोध का माध्यम है। साथ ही नई राजनैतिक चेतना के विकास का
भी। और नुक्कड़ नाटकों के बारे में दूसरी धारणा यह भी रही है कि इसका रूप तयशुदा और
अपरिवर्तनशील रहा है। इसी से जुड़ी समझ ये रही है कि इसमें कुछ लोग होते हैं जो
जोर जोर से अपने संवाद बोलतें हैं और गीत गाते हैं। हालांकि इसमें कुछ गलत नहीं है
और सचाई यही है कि नुक्कड़ नाटक राजनैतिक प्रतिरोध के माध्यम रहे हैं और उनकी
कलात्मक प्रासंगिकता उतनी नहीं है।
पर अब बात आगे बढ़ रही है और
जिस तरह से नुक्कड़ नाटकों में बदलाव आ रहा है और उनकी प्रस्तुतियों में नई चीजों
का समावेश हो रहा उससे इस दिशा में सोचने का वक्त आ गया है कि कैसे हमारे कॉलेजों
और विश्वविद्यालयों में इस विधा ने युवा वर्ग की चेतना को बदलना शुरू किया। दूसरे
शब्दों में कहें तो आज का नुक्कड़ नाटक एक गहन सांस्कृतिक अध्ययन की मांग कर रहा
है। तभी हम ये समझ सकते हैं कि किस तरह कई नए आर्थिक और सामाजिक प्रश्न हमारे युवा
वर्ग को मथ रहे हैं। पिछले हफ्ते दिल्ली विश्वविद्यालय के आत्माराम सनातन धर्म
कॉलेज (जिसे संक्षेप में एआरएसडी कॉलेज भी कहा जाता है) ने एक नुक्कड़ नाटक
प्रतियोगिता की जिसमें दस टीमों ने भाग लिया। सभी टीमें किसी न किसी शिक्षा
संस्थान से ही संबंधित थीं। जो नुककड़ नाटक इन टीमों ने प्रदर्शित कीं वे युवा
वर्ग की ऊर्जा और उनके भीतर आ रही नई राजनैतिक चेतना को तो उद्घाटित कर ही रहीं थी
साथ में नुक्कड़ नाटकों के रूप में आ रहे बदलावों का संकेत भी कर रही थीं। यहां
ऐसे ही कुछ विंदुओं की चर्चा होगी।
एक बड़ा परिवर्तन तो ये देखने
मं आ रहा है कि नुक्कड़ नाटकों के संसार में जेंडर का असंतुलन टूट रहा है और बड़ी
संख्या में लड़कियां नुक्कड़ नाटक कर रही हैं। हालांकि ये आरोप नहीं लगाया जा सकता
कि पहले के नुक्कड़ नाटक पुरुष केंद्रित
थे। पहले के दौर में नुक्कड़ नाटकों ने भी औरतों की सामाजिक हैसियत को लेकर जनचेतना
फैलाई। पर अब उसका असर दीख रहा है और ब़ड़ी संख्या में लड़किया खुद नुक्कड़ नाटकों
में अभिनय कर रही है और निर्देशन भी। कुछ टीमें तो ऐसी थी जिसमें सिर्फ लड़किया ही
थीं। ये एक गुणात्मक बदलाव है। आजादी के
बाद के भारतीय समाज के सामाजिक विकास के कई असंतुलन हैं, पर इससे भी इनकार नहीं
किया जा सकता कि सामाजिक स्तर पर महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ है। कम से कम
महानगरों में। इसका एक सूचक नुक्कड़ नाटक भी है। आखिर इतनी ब़ड़ी संख्या में
लड़कियों का नुक्कड़ नाटक करना सामाजिक परिवर्तन का संकेत नहीं तो और क्या है? और ये लड़कियां या
छात्राएं अपने आस पास के परिवेश से किस आलोचनात्मकता के साथ जुड़ रही हैं इसे भी
समकालीन नुक्कड़ नाटकों से पहचाना जा सकता है। ये सिर्फ नारी चेतना का उभार नहीं
है बल्कि सामाजिक चेतना का विस्तार भी है।
दूसरी बात जो रेखांकित किए
जाने योग्य है वो ये कि नुक्कड़ नाटकों के आंतरिक रूप में कई नए प्रयोग हो रहे
हैं। मोतीलाल नेहरू कॉलेज और इंस्टीच्यूट ऑफ होम एकोनॉमिक्स की टीमों ने जो
नुक्कड़ नाटक पेश में उनमें इतनी दृश्यात्मक विविधताएं थीं कि जो आज के दस साल
पहले के नुक्कड़ नाटकों में आम तौर पर देखने को नहीं मिलती थीं। यानी नुक्कड़
नाटकों में कलात्मक तत्व आ रहे हैं और अभिव्यक्ति की सूक्ष्मताएं भी। उनका संगीत
भी ज्यादा विविधतापूर्ण हो रहा है। वेशभूषा भी। जो रंगमंचीय़ तत्व पहले नुककड़
नाटकों की परिधि से बाहर थे वे अब वहां प्रवेश कर रहे हैं।
आत्माराम सनातम धर्म कॉलेज
दिल्ली विश्वविद्यालय का सबसे अधिक नाट्य सक्रिय कॉलेज है। ये कॉलेज पिछले कई
वर्षों से वरिष्ठ रंग समीक्षक और इसी कॉलेज के पूर्व अध्यापक जयदेव तनेजा की
देन को याद करते हुए `रंगशीर्षजयदेव नाट्य
समारोह’ करता
है। अपने कॉलेज के एक पूर्व शिक्षक को अवदान को याद करने का एक प्रशंसनीय तरीका
है। पर उससे बढ़कर कॉलेज और विश्वविद्यालय के रंग माहौल को सक्रिय करने का भी। इस बार भी इस समारोह में दो नाटक हुए- चित्रा
सिंह और जेपी सिंह के निर्देशन में `जिस लाहौर नई देख्या वो जन्माइ नई’ (लेखक- असगर वजाहत)
और `रोहित
त्रिपाठी’ के
निर्देशन में `आगरा बाजार’ (लेखक- हबीब तनवीर)। नुक्कड़ नाटकों का समारोह भी इसी समारोह का
हिस्सा था। दिल्ली
विश्वविद्यालय के दूसरे कॉलेज अगर आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज की तरह सांस्कृतिक
स्तर पर सक्रिय हों तो वहां का अकादमिक माहौल और भी बेहतर होगा।

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