कला रंग
एक अप्रतिम शकुंतला
रवीन्द्र त्रिपाठी
कालिदास का `अभिज्ञान शाकुंतलम’ एक क्लासिक नाट्य रचना है और विश्वभर में इस बारे में दो राय नहीं है। लेकिन इस नाटक को मंचित करना एक समस्या भी है। वो इस वजह से कि इसके क्लासिकी तत्व को मंच पर सुरक्षित रखना चुनौती होती है। ये हर निर्देशक के बूते की बात नहीं है। अगर आप रंगमंच के अलावा दर्शन में रुचि नहीं ऱखते तो इसके मर्म को नहीं समझ पाएंगे। जब निर्देशक इसे खुद नहीं समझेगा तो समझाएगा कैसे ?
`अभिज्ञान शाकुंतलम्’ सिर्फ एक औरत की दर्द गाथा भर नहीं है। इस नाटक के पीछे दूसरी गहरी सोच भी है। शकुंतला सिर्फ एक महिला पात्र नहीं है बल्कि वो प्रकृति की पुत्री है। ये भी कह सकते हैं कि वो खुद अपने में प्रकृति है। कण्व जब शकुतंला की विदाई करते हैं तो अपने आश्रम के पेड़ों से कहते हैं-
पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या
नादत्ते प्रियमंडनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्
आद्ये व: कुसुमप्रसूति समये यस्या भवत्युत्सव:
सेयं यानि शकुंतला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञायताम्
हिंदी में इसका अर्थ ये हुआ कि `वो शकुंतला अपने पतिगृह को जा रही है जो आपको (पेड़ को) पिलाये बिना स्वयं जल नहीं पीती थी, जो आभूषण-प्रिय होने पर भी आपके पल्लवों को नहीं तोड़ती थी (अपने श्रृंगार के लिए) और जो आपके भीतर फूलों के आगमन पर उत्सव मनाती थी; उस शकुंतला को जाने की अनुमति दें।‘ नाटक में एक दृश्य हैं जिसमें ये दिखाया गया है कि जब शकुंतला को पतिगृह में भेजने की तैयारी चल रही है तो आश्रम के वृक्ष और लताएं भी उसे वस्त्र और आभूषण देती हैं। निश्चय ही ये एक कल्पना है लेकिन कितनी सुकुमार और अर्थगर्भी कल्पना है?
प्रकृति के साथ इस तरह तदाकार हो चुकी शकुंतला एक अविस्मणीय चरित्र है। इस पक्ष को मंच पर किस तरह उदंघाटित किया जाता है ये `अभिज्ञान शाकुंतलम्’ की किसी प्रस्तुति के लिए प्रारंभिक प्रतिमान है। वरिष्ठ रंगकर्मी और गायिका रीता गांगुली के निर्देशन में पिछले दिनों राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में हुआ ये नाटक इस कसौटी पर खरा उतरता है। दरअसल एक क्लासिक नाटक की ये क्लासिक प्रस्तुति थी। संस्कृत में विकृष्टमध्यम रंगमंच की परंपरा रही है। इस नाटक में उसे भी सुरक्षित रखा गया है। रंगसज्जा विकृष्टमध्यम के अनुकूल रखी गई।
निर्देशक ने शास्त्रीय नृत्य के कुछ तत्वों – मुखाभिनय और मुद्राभिनय का इसमें सकारात्मक इस्तेमाल किया है। वस्त्र सज्जा और संगीत से लेकर प्रकाश व्यवस्था और मेकअप तक इतने सुचिंतित हैं कि लगता है कि निर्देशक ने संस्कृत रंगमंच के व्याकरण के हर पृष्ठ को सौंदर्य से आलोकित कर दिया है। पद संचालन से लेकर संवाद में गरिमा और ठहराव है। हालांकि इसमें काम करनेवाले कलाकार नाट्य विद्यालय के दूसरे साल के छात्र हैं पर वे सब अभिनय की बारीकी को पकड़ते हैं। छात्र प्रस्तुति के दायरे से बाहर निकल के ये एक क्लासिक प्रस्तुति बन जाती है।
निर्देशक ने कुछ अंशों में उर्दू शायरी और समकालीन हिंदी कविता का भी प्रयोग किया है। ये भी संस्कृत नाटकों की परंपरा में माना जाना चाहिए। अधिकांश संस्कृत नाटक कभी एकभाषी नहीं रहे यानी मात्र संस्कृत में नहीं रचे गए। उनमें प्राकृत का भी प्रयोग होता रहा। वक्त बदल गया है और आज अगर कोई निर्देशक संस्कृत नाटकों को मंचित करते हुए किसी और भाषा की कविताओं और संवादों का बीच बीच में प्रयोग करता है तो उसे संस्कृत नाटकों के मौलिक चरित्र के निकट ही माना जाना चाहिए। आखिर हर नाट्य-प्रस्तुति, चाहे वो किसी युग की लिखी रचना पर आधारित क्यों न हो, एक समकालीन सांस्कृतिक वक्तव्य भी होती है। दर्शक को नाटक में समकालीन संदर्भ भी मिलना चाहिए। प्रेम एक सार्वकालिक भावना है पर युग के अनुसार उसे जताने के अंदाज बदल जाते हैं। भाषा बदल जाती है। इस बदलाव के चिन्ह भी यहां दीखते हैं।
रीता गांगुली की शकुंतला आखिर में दुष्यंत के साथ उसके महल में वापस नहीं लौटती। वो सिर्फ अपने बेटे भरत को उनके साथ भेजती है। एक तरह से ये शकुंतला कुछ कुछ सीता की तरह हो जाती है। अपनी गरिमा और स्वायत्तता को सहेजती हुई। इस प्रस्तुति में समकालीन नारीवाद का सुर भी है। पितृसत्ता का निषेध भी। पर पूरा नाटक किसी एक खास विंदुं या व्याख्या तक सीमित नहीं है। इसमें पुरातन भी है, नवीन भी, शास्त्रीयता भी है और समकालीनता भी। कई स्वर यहां आपस में एकमेव हो गए हैं।
बेहतर होगा कि अगले साल होनेवाले भारत रंग महोत्सव की शुरुआत इस नाटक हो। कुछ लोग ये तर्क देंगे कि ये नाटक छात्र प्रस्तुति है। पर क्या रंगमंच में ये कहा नहीं जाता है कि कोई भूमिका छोटी या बड़ी नहीं होती, बल्कि अभिनेता बड़ा या छोटा होता है। फिर किसी छात्र प्रस्तुति को भी वो सम्मान क्यों नहीं मिलना चाहिए जो हर अच्छे नाटक को मिलना चाहिए? और दर्शकों को भी एक अच्छी नाट्य प्रस्तुति को देखने से वंचित क्यों किया जाना चाहिए?




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